Sunday, May 27, 2007

INDIA vs भारत

अपने भाषण मे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि अमीरों को अपनी सम्पति का "Vulgar display " नही करना चाहिए ताकि देश के आम आदमी को ये ना पता चले कि भारत में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो आमिर हैं, खुश हैं। उन्हें ये महसूस हो कि पुरे देश कि हालत उन्हीं कि तरह है ताकि उनका ग़ुस्सा या frustation अगले चुनाव में कॉंग्रेस के खिलाफ ना निकले।
Human Psychology भी अजीब ही है। हामारे सुख और दुःख चाहे कितने भी व्यक्तिगत प्रतीत होते हों, सच्चाई यही है कि ये अधिकांश situation में comparative ही होते हैं। हमारा बड़ा से बड़ा दुःख भी उतना बड़ा नही लगता यदि हमारा पडोसी भी उसी स्थिति मे हो।
राजीव गाँधी से लेकर मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्री ये खुलेआम स्वीकार करते हैं कि भारत मे भ्रष्टाचार काफी ज्यादा है और खासकर सरकारी महकमों में, फिर भी कोई कुछ भी प्रयास नही करता इसे हटाने के लिए और फिर दोष पूंजीपति को दिया जाता है। दूसरों के घरों को गालियाँ देने से अपना घर नही सुधर जाता। यदि आप चाहते हैं कि गरीब भी अपने आप को इंडिया का हिस्सा महसूस करें तो जितना पैसा आप उनपर हर साल खर्च करने का दावा करते हैं उसका कम से कम 75 % उनतक पहुंचाने का प्रयास कीजिये। वो आपसे चांद कि उम्मीद नही करता पर कम से कम "Basic education", affordable medical facility, elecricity (not free), road कि उम्मीद तो केर ही सकता है ना। ६० साल हो गए और आज भी उसे ये सारी चीजें उपलब्ध नही है, तो क्या उसे ग़ुस्सा होने का भी हक नही है? पर कॉंग्रेस को आज भी जाति और धर्म की ओछी राजनीति करने से फुर्सत मिले तब तो।

मनोज

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