Friday, September 28, 2007

ला पिला दे साकिया ....

ला पिला दे साकिया, पैमाना पैमाने के बाद,
होश की बातें करूँगा, होश में आने के बाद...

दिल मेरा लेने की खातिर मिन्नतें क्या क्या ना की,
कैसे नज़रें फेर ली, मतलब निकल जाने के बाद...

वक़्त सारी ज़िंदगी में दो ही गुज़रे है कठिन,
एक तेरे मिलने से पहले, एक तेरे जाने के बाद...

सुर्खरु होता है ईनसां , ठोकरे खाने के बाद,
रंग लाती है हिना, पत्थर पे घिस जाने के बाद

3 comments:

Divine India said...

बहुत ही विशिष्ट गज़ल है… इसे मुन्नी बेगम ने क्या शानदार ढंग से गाया है… आपने इसे प्रस्तुत कर पुरानी यादे ताजा कर दी… धन्यवाद!!!

Udan Tashtari said...

शायर का नाम साथ में दे दें तो प्रस्तुति और सुन्दर हो जाती है. आभार इस प्रस्तुति का.

Manoj said...

मुझे ये गजल आज ही मिली थी और इतने सालों बाद अपने मनपसंद गजल को देख कर रहा नही गया.... तुरत ही इसे अपने ब्लोग पर डाल दिया। मुझे इसके शायर का नाम नही पता था इसलिये दे नही पाया। यदि आप जानते हो तो कृपया बता दें , मैं पोस्ट कर दूंगा।
मनोज