रविश कुमार के article के लिए :
गोधरा के अलावे मुझे नही पता कि मोदी ने कौन सा ऐसा जुर्म किया है जिसके चलते रविश भाई को वो इतने ज्यादा नापसंद है। वैसे, मुझे नही पता कि लालू और मोदी मे से किसने ज्यादा बेकसूर लोगों को मारा है। हर साल बिहार मे बाढ़ के चलते कम से कम १००० लोग मारे जाते हैं। १५ साल तक गद्दी पर रहने के बावजूद लालू ने इसका कोई हल नही निकाला। क्या ये नरसंहार नही है?
पिछले 4-5 सालों मे असम, जम्मू, पंजाब मे ना जाने कितने बिहारी मजदूर आतंकवाद कि भेंट चढ़ गए। क्या बिहार का आर्थिक रुप से पिछ्ड़ा होना इसका मूल कारण नही है? और क्या इसके लिए लालू दोषी नही हैं?
फिर क्योंकर communalism गरीबी से बेहतर option नही है? मैं communalism का समर्थक नही हूँ पर मैं ये मानता हूँ कि गरीबी और बेकार कानून व्यवस्था इससे कंही ज्यादा खतरनाक हैं।
जितने मुस्लिम मोदी के डर से गुजरात छोड कर कंही और जा बसें हैं उनसे ज्यादा (शायद कई गुना ) लोग बिहार कि गरीबी और दुर्व्यव्स्ता से ऊब कर और डर कर बिहार से बाहर हैं..... आप और हम खुद भी तो उन्ही लोगों मे से एक हैं.... दूसरों का दर्द तो आपको दिख रहा है जो कि अच्छी बात है पर अपने जख्मों को क्यों भूल रहें हैं?
किसे बुरा कंहू मैं ? और किसे चूनुं सापनाथ और नागनाथ मे से?
मनोज
Monday, October 15, 2007
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10 comments:
आपका प्रश्न सचमुच शोचनीय है। लालू के भ्रष्टाचार तथा गरीबों के शोषण की तुलना में मोदी की सांप्रदायिकता बेहतर है, कम से कम गुजरात के लोग आर्थिक रुप से तो सुखी हैं।
पता नहीं नरेन्द्र मोदी से सेकुलरिस्टों को इतना डर क्यों लगता है। इनके प्रिय नेता है बुध्ददेव भट्टाचार्य और लालू यादव। कम्युनिस्टों ने बंगाल में 30 साल शासन करके वहां हालात ऐसे बना दिए है कि लोग भूखे मर रहे है। पिछले कई दिनों से लोग राशन की दूकान लूटकर अपने पेट की आग बुझा रहे है। सिंगूर और नंदीग्राम में तो बर्बरता की सारी हदें पार कर दी है। मेधा पाटेकर हे लिखा है-विरोध करने पर महिलाओं के साथ बलात्कार कर उनकी योनी में रॉड डालकर उसे चीर दिया जाता है। पुरूषों का पेट चीरकर उन्हें तालाब में फेंक दिया जाता है ताकि लाश पानी के उपर नहीं आ सके। लालू राज का तो कहना ही क्या था तब तो बलात्कार, गुंडागर्दी, अपहरण उद्योग ही थे। सरकारी जूठन पर पलने वाले पत्रकारों से क्या आशा की जा सकती है। गुजरात की जनता ही इनका मुंहतोड जवाब देगी।
धर्मनिरपेक्ष (हा हा हा हा) पत्रकारों का पेट इसलिये भी दुखता है कि गुजरात लगातार तरक्की कर रहा है और बाकी राज्य गढ्ढे में जा रहे हैं...
गुजरात की ग्रोथ रेट की ग्रोथ रेट में अगर 2-3% कमी हो जाये तो ये मित्र ताण्डव नृत्य कर विश्व गुंजायमान कर देंगे। झारखण्ड-बंगाल में तो अमन-चैन है।
पर यह चलेगा गुजरात चुनाव के चलते।
अरे रे रे रे आप समझे नहीं. यह खिज है जो बाहर आ रही है. आप भी ना... मजे लें. काहे खुन जलाते हैं.
बंगाल में लोगो को हथेली पर चाँद दिखाया था, क्या गति हुई है आपके सामने ही है. अब इनकी विचारधारा को धत्ता बता कर गुजरात आगे बढ़ रहा है. देखा नहीं जाता इनसे. पहले मोदी खराब था, अब इनके लिए सारा गुजरात ही बेवकुफ है.
कम्युनिस्टों को अहिंसा का गुणगान करते देखकर हँसी आती है। कल तक ये दुनिया को 'संघर्ष' की सीख दे रहे थे (काश्मीरी जेहादियों और माओवादियों के साथ इनकी अब भी सहानुभूति है) अब ये अहिंसा की बात करते हैं। कम्युनिस्टों ने दुनिया में जितने लोगों (सभी चिन्तनशील और सृजनशील लोगों) की हत्या की है उसकी बराबरी करना असंभव है।
जिन्होने केवल बंगाल ही नहीं, पूरे पूर्वी यूरोप को पिछड़ा बना दिया, वे विकास की बात करते हैं, शर्म नहीं आती!!
इनके सारे सिद्धान्त, संकल्पनायेँ और भविष्यवाणियाँ झूठ निकलीं। गुजरात में मोदी जब विकास की बात करते हुए ताली ठोक रहे हैं तो इनको पसीने आ रहें हैं। जिस तरह मगरमच्छ का जोर पानी में ही चलता है, इनका जोर कपटी-पंथनिरपेक्षता का ढ़ोंग करके ही चलता है।
अगर ये सच्चे सेक्युलर होते तो-
समान नागरिक संहिता की बात करते।
मजहब के आधार पर आरक्षण का विरोध करते।
स्कूलों में कुरान और बाइबल की शिक्षा का विरोध करते।
उर्दू के नाम पर मुसलमानों में अलगाव नहीं डालते।
हज सबसिडी का विरोध करते।
मुस्लिम लीग से गले नहीं मिलाते।
रोज-रोज घोषित होने वाले फतवों पर तीखी प्रतिक्रिया करते।
काश्मीर से धारा ३७० को हटाये जाने का समर्थन करते।
देश के लोग इनको समझें, यही प्रार्थना है।
बिल्कुल सही बात ! वो क्या है कि जब कुछ तारीफ़ हो जाती है न दिमाग डांडिया करने लगता है. और दिल्ली मे डांडिया करते वक्त गुजरात न याद आए कैसे हो सकता है / "खविश" को प्रोमोशन चाहिए. बॉस की बीबी और
बॉस की साली कमुनिस्ट राग का "फाग" गाने से खुश होती है.अब ये सीजन के हिसाब से डांडिया को प्रमुखता
दे रहा है. लालू के ख़िलाफ़ ये क्या बहुत पहुंचे हुए पत्रकार भी मुह न खोल पाते.
ये जहाँ रहता है वहाँ ६ घंटे बिजली नही रहती ! कभी भी न इसका कलम न दिल चला की कुछ लिखा जाए.लिखता
तो बिजली आती कम से कम ३ घंटे इसका इनवर्टर आराम करता.
अपने को पत्रकार कहता है पत्र लिखने आता नही.बस जब तब "प्रोमोशन शास्त्र " लेकर "सूत्र'' फेकना शुरू कर देता है. प्याज पर लिखे न पनीर पर क्यों लिखता है ?
लेकिन एक बात है आधुनिक फैशन मे बड़ी "बिंदी" लगाना कम हिम्मत की बात नही.
हमे नज़र रखना होगा की कोई "कमुनिस्टगिरी" के बहाने "कमिनागिरी" पर तो नही आ गया.
कभी नारा था "बिहार अब गुजरात बनेगा चम्पारण शुरुआत करेगा " शायद अभी के लिए भी बुरा नही है.
मनोज जीं को धन्यवाद ! फॉर सेयिंग खोंखला को खोंखला !
जय हिंद ! जय भारत !
आप सब का शुक्रिया पर एक request है कि please ऐसी भाषा का प्रयोग ना करें जो आप खुद के लिए सुनना पसंद नही करेंगे।
मैंने ये पोस्ट ये सोच कर भी कि थी कोई तो होगा जो मुझे समझा सकेगा कि लालू का शासन मोदी के शासन से बेहतर कैसे है? शायद ऐसे लोग मेरी पोस्ट पर ध्यान नही देते ..... चलो कोई ना, आज ना कल कँही ना कँही कोई मिल ही जायेगा जो मुझे ये समझा सके.....
मनोज
aakhir in sab baaton ka jimmedar kaun hai...kya bihar ki janta khudh in baaton ke liye jimmedar nahin hai....aaj bhi bihar ki janta jaat paat aur majhab se upar nahin uth paayi hai...aaj bhi Bihar mein chunav ka mudda jaat paat hota hai...naa ki vikash...kya bihar ko pangoo karne mein khudh bihariyon ki bhumika nahin hai....
एक ही कहूँगा 'The grass is greener on other side' तभी आप को मोदी ज्यादा अच्छा लग रहा है नही तो सारे एक ही थाली के चट्टे बट्टे है. यही लालू रेलवे मैं क्यों कमल दिखा रहा है ?
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