पिछले कुछ दिनों में ना जाने कितनी बार "Freedom of expression" पर होने वाली बहसों को देखने और सुनने का मौका मिला। हमेशा ही २ तरह के view देखने को मिला । एक जो हर हाल में "Freedom of expression" का पक्षधर है और दूसरा चाहता है कि स्वंत्रता जिम्मेदारी के साथ ही आती है। आपके लिखने या बोलने से यदि किसी ग्रुप की धार्मिक या ऐसी ही कोई और भावना को ठेस पहुंचती है , तो फिर आपको ऐसा नही लिखना चाहिए। पहले तबके में ज्यादातर ऐसे लोग थे जो समाज में लेखक या "intellectual" और "Libreal view" रखने वाले माने जाते हैं। दुसरे तबके में ज्यादातर धर्म या जाति के ठेकेदार type के लोग बैठे मिले।
हर मुद्दे कि तरह इस बार भी मेरे मन में कुछ प्रश्न बने रह गए। मैं जानना चाहता था कि यदि कोई लेखक कोई किताब लिखे और "Publisher" उसके लेख में कुछ change करने को कहता हो तो कितने लेखक ऐसे हैं जो अपने "Freedom of expression" के अधिकार को लेकर लड़ना पसंद करते हैं? खैर, ये उनकी personal choice है।
मैं साथ ही सोच रहा था कि न जाने कितने लेखों में , कितने फिल्मों में ठाकुरों और ब्राह्मणों के खिलाफ कितनी सारी बातें बोली जाती हैं , पर हाल ही में "आजा नाच ले " में जब "मोची " शब्द का इस्तेमाल हुआ तो UP और "Punjab " की सरकारों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और इन शब्दों के हटाने पर ही प्रतिबंध भी हटा। कंहा थे "Freedom of expression" के ठेकेदार ?
पर एक सवाल ये भी है की क्या भावनाएं सामुहिक होती है? जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि किसी पेंटिंग से हिन्दुओं की धार्मिक भावना को चोट पहूँची है तो किन हिन्दुओं कि बात कर रहा है वो? न जाने कितने हिन्दू हैं जो भगवान राम में आस्था नही रखते , कितने ऐसे हैं जो निर्गुण ब्रह्म के उपासक हैं, और कई ऐसे भी हैं जो अपने धर्म कि निरंतर नई व्याख्या चाहते हैं। फिर किसने उन लोगों को, जो इसका विरोध कर रहे हैं , में तमाम हिन्दुओं का ठेका सौंप दिया है?
मनोज
Wednesday, December 19, 2007
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment